ना जाने क्या छूट रहा ना जाने क्या गुम हो रहा ।
यूं तो हूं अपने ही घर में पर ना जाने क्या ओझिल हो रहा।
कुछ तो है जो मन खोज रहा कुछ तो है जो विचलित कर रहा।
सोचा नहीं था कि कभी खुद की आजादी को अपने ही बनाए गए फनदें से ही घोटूंगा और खुद ही उस घुटन को सह कर भी जीने की आश रखूंगा।

ना जाने क्या छूट रहा ना जाने क्या गुम हो रहा।
दिन प्रतिदिन एक आश सी थी मन में कि आने वाला सूरज देगा एक उजाला ,सब होगा फिर से प्रज्वलित ,होंगी सबके मन में एक अलग ही विचारधारा ।
मन जब भी भोर का सूरज मेघ के मध्य में देखता था, बस मन में ये भाव उठता था कि कोई नहीं ये मेघ हैं जल्द ही हट जाएंगे ।
रोज अपनी आशा भारी नीघाओं से काले बादलों के हटने कि विनती करता था ।
ना जाने क्या छूट रहा ना जाने क्या गुम हो रहा।

अब ना जाने क्यूं कमजोर पड़ रहा मन ,ना जाने क्यूं विचलित हो रहा।
उड़ते पंछी, खुला आसमान , बीन लगाम के बिजली सी गुजरती हवाएं मन में हिलोरे पैदा कर रही ,चीख चीख कर बोल रही हे मन! क्या हुआ तुझे – तू तो बड़ा मनमौजी था ,तू तो अपना राजा था, दिखता नहीं अब हमारे करीब.
ऐसा लगता है तुझे किसे ने कैद कर लिया है,तू चाह कर भी ना निकल पा रहा ।
एक पछी करीब से निकलता हुआ बोला कि अब तू नहीं आता तो उड़ान में भी मज़ा नहीं है ,लगता है आसमान में हमारी कलाबाजियों कि तस्वीर भी कोई नहीं लेता । हमे देख अब कोई प्रफुलित भी नहीं होता।
ना जाने क्या छूट रहा ना जाने क्या गुम हो रहा।

मन मेरा सोच रहा कब वो जाएगा फिर से उन पहाड़ों की उचाइयाओं में।
हे! मानव अब इस मन की इच्छा तुम ही पूरी कर सकते हो ,इसके गले से फंदा अब तुम ही हटा सकते हो।

आओ करे मिल के प्रयास इस मासूम ,निश्छल मन की आजादी के लिए ।
फिर से जाना है इस मन को अपने मन कि करने ,आओ करे मिल के प्रयास।

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